सोमवार, 28 मार्च 2011

गौरतलब-
श्री एल के आडवानी ने २७ मार्च को यह पीस अपने ब्लॉग पर पोस्ट की है.


टेलपीस
madhav-book
संसदीय लोकतंत्र के स्थायित्व के अनेक नाजुक मुद्दों से भारत को अभी भी जूझना है। इसमें से एक वंशानुगत सत्ता से निकला है। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारत ने 550 से ज्यादा रियासतों को समाप्त कर दिया था और कुछ वर्षो के पश्चात्  पूर्व राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त कर  समाजवादी होने की जोरदार घोषणाएं की गई। लेकिन राजनेताओं के राजसीपरिवार पूरे देश में जोर-शोर से नए उत्साह से अपने को स्थापित कर रहे हैं। कभी एक समय पर  पाकिस्तान के 20 सत्तारुढ़ परिवार भारत में चुटकुलों का मसाला होते थे क्योंकि वे लोकतंत्र का ढोंग करते थे। अब सभी राजनीतिक दलों में गांव स्तर से राज्य स्तर तक सत्ताधारीपरिवार मिल जाएंगे। अधिकांश तथाकथित युवा सांसद और विधायक जिन्हें राजनैतिक दलों में युवा और ताजा चेहरे के रुप में  प्रस्तुत किया जाता है वे सत्ता में बैठे लोगों के बेटे, दामाद, बेटियां, बहुयें, पोते, रिश्तेदार इत्यादि हैं…..

यह विशेष उल्लेखनीय है, कम्युनिस्ट और वामपंथी दलों के सिवाय भारत में लगभग सभी अन्य दल पारिवारिक कम्पनी है। पिछले 12 वर्षों से सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष हैं और दिल्ली के सिंहासन के पीछे की असली शक्ति हैं, जन्म से इटली मूल की हैं; लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार और राज्यसभा के चेयरमैन हामिद अंसारी भारतीय विदेश सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं; और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भारतीय आर्थिक सेवा के सेवानिवृत अधिकारी हैं! किसने कल्पना की होगी  कि एक बिलियन से ज्यादा जनसंख्या वाले भारत में, 60 वर्षों के संसदीय लोकतंत्र के बाद भी जनता में से नेतृत्व का इतना अभाव होगा?

माधव गोडबोले
पूर्व गृहसचिव और सचिव न्याय,
भारत सरकार, आई.ए.एस. (सेवानिवृत्त)-1959-1996
(स्वंय सेवानिवृति ली)
की नवीनतम पुस्तक
इण्डियाज़ पार्लियामेण्टरी डेमोक्रेसी ऑन ट्रायल-प्रकाशित 2011-से साभार 

शनिवार, 19 मार्च 2011

यदि सुन्दर
कुछ हो सकता है
तो वह यह की
तुम्हें सोचना
और सोचना...सोचते रहना
भीतर भीतर टीसते रहना

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

मैं था 
जब तुम नहीं थीं 
मैं था
जब तुम थीं
मैं हूँ 
जब तुम नहीं हो  

पर बदल गया सब...
हिंद युग्म का वार्षिक कार्यक्रम



काव्यपाठ करते  हुए

इस कार्यक्रम में वर्ष 2010 के 12 यूनिकवियों को सम्मानित किया गया। यूनिकवि सम्मान 2010 से सम्मानित कवियों में एम॰ वर्मा, कृष्णकांत, विमल चंद्र पाण्डेय, संजीव कुमार सिंह, मृत्युंजय साधक, आलोक उपाध्याय 'नज़र', अनिल कार्की, सुभाष राय, महेन्द्र वर्मा, अपर्णा भटनागर, वसीम अकरम और स्वप्निल तिवारी आतिश शामिल हैं। इस उत्सव में समय-समय पर सम्मानित यूनिकवियों ने अपनी प्रतिनिधि कविता का पाठ भी किया। काव्यपाठ करने वाले कवियों में कृष्णकांत, अनिल कार्की, स्वप्निल तिवारी आतिश, आलोक उपाध्याय 'नज़र', एम॰ वर्मा, मृत्युंजय साधक और वसीम अकरम के नाम प्रमुख हैं।

हिंद युग्म के वार्षिक कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ इस लिंक पर देख सकते हैं-














मंगलवार, 8 मार्च 2011


सामंतशाही से उबरने का समय 

बीते महीने उत्तर प्रदेश् में मायावती ने जगह-जगह का दौरा किया जिसके चलते पूरे सूबे में खासी गहमा-गहमी रही। उनका काफिला जहां-जहां से गुजरा, वहां वहां पूरे दिन के लिए आपातकाल जैसी स्थितियां देखने को मिलीं। पूरा यातायात बंद कर दिया गया।
उनके दौरे के चलते शहर का ठप होना क्यों जरूरी है? मायावती को किससे डर है? जब वे शहर में आयें तो बाकी जनता अपने घरों से बाहर क्यों न निकले?
नेताओं के काफिलों की वजह से कई लोगों की जानें पहले भी जा चुकी हैं। दूसरे लोगों की तरह मायावती ने इस पर उदासीन रूख अपनाया और आगे से प्रशासन काफिले के दौरान किसी मरते हुए व्यक्ति को अस्पताल जाने से न रोके, इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बुलंदशहर में दलित-मसीहा मायावती के जिंदाबाद के नारे के पीछे एक दलित महिला की मौत हो गयी। क्यांकि वह काफिले के कारण अस्पताल नहीं जा सकती। इस पर कार्रवाई करने की जगह इस खबर को ही दबाया गया।
यह किसकी सवारी थी? एक चुने हुए जनप्रतिनिधि की कि किसी मध्यकालीन राजकुमारी की, जिसके काफिले के बीच कोई प्राणों की भीख भी नहीं मांग सकता?
मिर्जापुर के एक अस्पताल में मायावती के दौरे के दौरान एक मरीज की पानी के लिए आवाज लगाते हुए मौत हो गयी। सभी डाक्टर बहन मायावती के आवभगत में लगे हुए थे।
इसके अलावा मायावती जहां-जहां गयीं, वहां-वहां कुछ न कुछ अधिकारी या तो हटाये गये, या फिर उनका निलंबन किया गया। हालांकि, मायावती ने अपने पांच सालों के कार्यकाल में कभी इस बात का जिक्र नहीं किया गया कि अधिकारियों पर नेताओं की ओर से अनुचित दबाव नहीं डाले जायें। उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है जहां के विधायक व सांसद स्कूलों में बंटने वाले भोजन से लेकर गरीबों में बंटने वाले अनाज तक में हिस्सा मांगते हैं।
दलित नेता की अगुआई में यदि तानाशाही-ठाकुरशाही अथवा सामंतशाही बरकरार है, जिसे सरकार मंत्री पद आदि देकर संरक्षण भी दे रही है, तो जनतंत्र का क्या होगा? ब्राहमण और ठाकुरों के अनुचित वर्चस्व का क्या बिगड़ेगा? और पहले से अब की स्थिति में अंतर क्या आया? कांगे्रस और बीजेपी से मायावती की बसपा किन अर्थों में अलग है?
पिछले दो तीन दिनों से सपा की सरकार विरोधी रैली और विपक्ष पर मायावती का डंडा काफी चर्चा में है। सपा का आंदोलन एक राजनीतिक अराजकता के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। इससे पहले के सपाई कार्यकाल को हम अभी कहा भूले हैं। कोई औसत आदमी भी यही कहेगा कि बसपा का विकल्प सपा तो कभी नहीं हो सकती। क्योंकि उसके समाजवादी आदर्श एक परिवार के सदस्यों के हितों के आसपास ही सिमट गये हैं जिनकी रक्षा सुरक्षा के लिए अपराधियों तक का सहारा लेने में उसे कोई हिचक नहीं है।
पिछले कई नेताओं द्वारा बेखौफ बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आयीं और उन्हें जैसे तैसे ढांक मूंद कर रफा दफा कर दिया गया।
दिन प्रतिदिन की घटनाओं से क्या आपको लगता है कि उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र जैसी कोई चीज है?
उत्तर प्रदेश के उत्थान के लिए सूबे की जनता को अभी कितने बरस इंतजार करना होगा? और इंतजार किसके बूते? क्या अब उसके खुद उठ खड़े होने का समय नहीं आ गया है?

रविवार, 6 मार्च 2011


कमाता-खाता आदमी...


खटता रहता हूँ दफ्तर में 
कोल्हू के बैल की तरह 
पीछे-पीछे फटकारता मालिक 
फटकारता है पैना 
क्योंकि मुझे चारा देता है वह 
थक कर थमने लगते हैं ज्यों ही पांव 
पड़ता है पीठ पर पैना सटाक से 
तिलमिला कर भागता हूँ फिर 
कोल्हू के आरी-आरी 

यह हर मेहनतकश 
आदमी की मुश्किल है
जो भी चाहता है 
पसीना बहाकर पेट पालना

अकेला नहीं हूँ मैं 
पुट्ठे पर पैना खाने वाला 
और भी हैं मेरी तरह 
उच्च-शिक्षा प्राप्त युवा 
चलते जाते हैं चुपचाप 
जुए में नधे हुए 
निकलता हूँ जब दफ्तर से
चुसा हुआ-चुका हुआ 
गिरता हूँ घर जाकर 
निढाल बिस्तर पर 
मर जाता हूँ एक कतरा रोज़ 
बच जाती नौकरी 
भरता हूँ उदर 
पाता हूँ तारीफ 
मैं कमाता-खाता आदमी 
बेचारा!




गुरुवार, 3 मार्च 2011


कई दिनों से

कई दिनों से कानों ने
नहीं सुने तेरे सुर 
कई दिनों से रगों में 
नहीं उतरी तेरी आवाज़ 
कई दिनों से सांसों में
देखा नहीं तुम्हें
कई रोज़ हुए 
गूंजी नहीं तेरी हंसी 
कई रोज़ से महसूसा नहीं तुम्हे 
कि अब आ जाओ 
खिलखिलाते हुए 
दिले-वीरां कि उदासी हर लो 


मीडिया में जनांदोलनों की जगह 


आर टी आई कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल का कहना है कि मीडिया, खासकर खबरिया चैनलों में, ख़बरों का चयन असंवेदनशील ढंग से किया जाता है. अन्ना हजारे के अनशन कि खबर आज टीवी चैनलों में जगह नहीं पाती. उनका कहना है कि आज के हालात में तटस्थ रहने गुंजाइश नहीं है. आपको अपना पक्ष तय करना पड़ेगा. केजरीवाल जो चिंताएं 
जता रहे हैं क्या वाकई यह चिंता का विषय है ? अगर हाँ, तो ऐसी स्थिति क्यों है? मेरे ख्याल से ज्यादातर लोगों को इसका जवाब मालूम है. जनमाध्यमों और पत्रकरों का पक्ष पहले से तय है. वे उस पक्ष में नहीं हैं जिधर अन्ना हजारे या अरविन्द केजरीवाल हैं. वे उस पक्ष में नहीं हैं जिधर अमित जेठवा थे. हाँ, इसके अपवाद भी ज़रूर हैं. मीडिया में ऐसे लोग भी बेशक हैं जो अन्ना हजारे या केजरीवाल जैसा सोच सकते हैं. मगर वे नौकरी के खूंटे से बंधे हैं, और अपनी गुलामी के उत्सव को सेलिब्रेट कर रहे हैं. 
हो सकता है मेरा ये कहना किसी को बुरा लगे, मगर यदि किसी भी वजह से आप हमेशा सही को सही नहीं कह सकते, गलत को गलत नहीं कह सकते, तो आप स्वतंत्र कहाँ हैं? 
अन्ना हजारे के बोलने और वरिष्ठ पत्रकारों के चुप रहने का फर्क, उनकी प्राथमिकताओं का फर्क है. हर पत्रकार यह जानता है कि वह किसी न किसी पूंजीपति अथवा नेता के लिए काम कर रहा है. ऐसे में अन्ना हजारे का पक्ष उसके मालिक के हितों के खिलाफ है. वह ऐसा कभी नहीं करेगा. 
इसके लिए अदम्य साहस कि ज़रूरत होती है, जो आज कहीं नहीं दिखती. क्या यह आश्चर्य नहीं कि पूरी हिंदी पत्रकारिता में कोई ऐसा चेहरा, कोई आवाज़ नहीं है जिस पर हम संतोष जता सकें. हर किसी कि ज़बान पर एक बेहूदा तर्क है कि यह समय कि नजाकत है.
 रोज़ी-रोज़गार के वृहद् तर्क को नाकारा नहीं जा सकता, पर तात्कालिक लाभ कि हमें भरी कीमत चुकानी पद सकती है. बोलने कि सीमायें तय हो रही हैं और इसके दूरगामी परिणाम बेहद भयावह हैं. हमें यह तय करना होगा कि हमारी स्वतंत्रता ज्यादा महत्व कि है या फिर रोज़गार. रोज़गार तात्कालिक राहत ज़रूर देता है, लेकिन गुलामी कि कीमत सदियों को चुकानी पड़ती हैं. छोटे-छोटे पूंजीपतियों के छोटे- छोटे हित उन सार्वभौमिक मूल्यों से बड़े नहीं हो सकते. उनके लगातार  दरकिनार किये जाने का ही परिणाम है कि हम एक के बाद महाघोटालों के मूक दर्शक बने हुए हैं. 
 क्या मीडिया इन बातों को नहीं समझता? बखूबी समझता है. बस वह चुप रहकर उन बातों को समर्थन देता है जो उसे फायदा पहुंचाती हैं. मीडिया के मुनाफे का सारा गणित  कार्पोरेट ही तय करता है, जिसके विरोध में अन्ना हजारे या मेधा पाटेकर उतरते हैं. इसलिए मीडिया अगर उनका सहयोग नहीं करता, तो विरोध नहीं करेगा. जिस पूंजीपति के पैसे से चैनल चलता है, वह उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विरोध कभी नहीं करेगा. इसलिए फिलहाल तो अरविन्द केजरीवाल और उनकी तरह मीडिया से उम्मीद करने वालों को  निराशा ही हाथ लगेगी. कार्पोरेट संचलित मीडिया कार्पोरेट के ही विरोध में नहीं खड़ा हो सकता, इसलिए वह जनांदोलनों के साथ नहीं खड़ा होगा. और जहाँ तक अपना पक्ष तय करने कि बात है, तो मीडिया का पक्ष तय है. उसका लक्ष्य मुनाफे से परे नहीं है, भले ही उसे नाग-नागिन, भूत-प्रेतों के किस्सों का सहारा लेना पड़े.