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March, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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गौरतलब- श्री एल के आडवानी ने २७ मार्च को यह पीस अपने ब्लॉग पर पोस्ट की है.

टेलपीस संसदीय लोकतंत्र के स्थायित्व के अनेक नाजुक मुद्दों से भारत को अभी भी जूझना है। इसमें से एक वंशानुगत सत्ता से निकला है। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारत ने 550 से ज्यादा रियासतों को समाप्त कर दिया था और कुछ वर्षो के पश्चात्पूर्व राजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त करसमाजवादी होने की जोरदार घोषणाएं की गई। लेकिन राजनेताओं के ‘राजसी‘ परिवार पूरे देश में जोर-शोर से नए उत्साह से अपने को स्थापित कर रहे हैं। कभी एक समय परपाकिस्तान के 20 सत्तारुढ़ परिवार भारत में चुटकुलों का मसाला होते थे क्योंकि वे लोकतंत्र का ढोंग करते थे। अब सभी राजनीतिक दलों में गांव स्तर से राज्य स्तर तक ‘सत्ताधारी‘ परिवार मिल जाएंगे। अधिकांश तथाकथित युवा सांसद और विधायक जिन्हें राजनैतिक दलों में युवा और ताजा चेहरे के रुप मेंप्रस्तुत किया जाता है वे सत्ता में बैठे लोगों के बेटे, दामाद, बेटियां, बहुयें, पोते, रिश्तेदार इत्यादि हैं…..
यह विशेष उल्लेखनीय है, कम्युनिस्ट और वामपंथी दलों के सिवाय भारत में लगभग सभी अन्य दल पारिवारिक कम्पनी है। पिछले 12 वर्षों…
यदि सुन्दर कुछ हो सकता है तो वह यह की तुम्हें सोचना
और सोचना...सोचते रहना भीतर भीतर टीसते रहना
मैं था  जब तुम नहीं थीं  मैं था जब तुम थीं मैं हूँ  जब तुम नहीं हो  

पर बदल गया सब...
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हिंद युग्म का वार्षिक कार्यक्रम



हिंद युग्म के वार्षिक कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ इस लिंक पर देख सकते हैं-
http://kavita.hindyugm.com/2011/03/hindi-yugm-varshikotsav-2010.html












सामंतशाही से उबरने का समय 

बीते महीने उत्तर प्रदेश् में मायावती ने जगह-जगह का दौरा किया जिसके चलते पूरे सूबे में खासी गहमा-गहमी रही। उनका काफिला जहां-जहां से गुजरा, वहां वहां पूरे दिन के लिए आपातकाल जैसी स्थितियां देखने को मिलीं। पूरा यातायात बंद कर दिया गया।
उनके दौरे के चलते शहर का ठप होना क्यों जरूरी है? मायावती को किससे डर है? जब वे शहर में आयें तो बाकी जनता अपने घरों से बाहर क्यों न निकले?
नेताओं के काफिलों की वजह से कई लोगों की जानें पहले भी जा चुकी हैं। दूसरे लोगों की तरह मायावती ने इस पर उदासीन रूख अपनाया और आगे से प्रशासन काफिले के दौरान किसी मरते हुए व्यक्ति को अस्पताल जाने से न रोके, इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा।
बुलंदशहर में दलित-मसीहा मायावती के जिंदाबाद के नारे के पीछे एक दलित महिला की मौत हो गयी। क्यांकि वह काफिले के कारण अस्पताल नहीं जा सकती। इस पर कार्रवाई करने की जगह इस खबर को ही दबाया गया।
यह किसकी सवारी थी? एक चुने हुए जनप्रतिनिधि की कि किसी मध्यकालीन राजकुमारी की, जिसके काफिले के बीच कोई प्राणों की भीख भी नहीं मांग सकता?
मिर्जापुर के एक अस्पताल में मायावती के …
कमाता-खाता आदमी...

खटता रहता हूँ दफ्तर में  कोल्हू के बैल की तरह  पीछे-पीछे फटकारता मालिक  फटकारता है पैना  क्योंकि मुझे चारा देता है वह  थक कर थमने लगते हैं ज्यों ही पांव  पड़ता है पीठ पर पैना सटाक से  तिलमिला कर भागता हूँ फिर  कोल्हू के आरी-आरी 
यह हर मेहनतकश  आदमी की मुश्किल है जो भी चाहता है  पसीना बहाकर पेट पालना
अकेला नहीं हूँ मैं  पुट्ठे पर पैना खाने वाला  और भी हैं मेरी तरह  उच्च-शिक्षा प्राप्त युवा  चलते जाते हैं चुपचाप  जुए में नधे हुए  निकलता हूँ जब दफ्तर से चुसा हुआ-चुका हुआ  गिरता हूँ घर जाकर  निढाल बिस्तर पर  मर जाता हूँ एक कतरा रोज़  बच जाती नौकरी  भरता हूँ उदर  पाता हूँ तारीफ  मैं कमाता-खाता आदमी  बेचारा!



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कई दिनों से
कई दिनों से कानों ने नहीं सुने तेरे सुर  कई दिनों से रगों में  नहीं उतरी तेरी आवाज़  कई दिनों से सांसों में देखा नहीं तुम्हें कई रोज़ हुए  गूंजी नहीं तेरी हंसी  कई रोज़ से महसूसा नहीं तुम्हे  कि अब आ जाओ  खिलखिलाते हुए  दिले-वीरां कि उदासी हर लो 
मीडिया में जनांदोलनों की जगह 

आर टी आई कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल का कहना है कि मीडिया, खासकर खबरिया चैनलों में, ख़बरों का चयन असंवेदनशील ढंग से किया जाता है. अन्ना हजारे के अनशन कि खबर आज टीवी चैनलों में जगह नहीं पाती. उनका कहना है कि आज के हालात में तटस्थ रहने गुंजाइश नहीं है. आपको अपना पक्ष तय करना पड़ेगा. केजरीवाल जो चिंताएं जता रहे हैं क्या वाकई यह चिंता का विषय है ? अगर हाँ, तो ऐसी स्थिति क्यों है? मेरे ख्याल से ज्यादातर लोगों को इसका जवाब मालूम है. जनमाध्यमों और पत्रकरों का पक्ष पहले से तय है. वे उस पक्ष में नहीं हैं जिधर अन्ना हजारे या अरविन्द केजरीवाल हैं. वे उस पक्ष में नहीं हैं जिधर अमित जेठवा थे. हाँ, इसके अपवाद भी ज़रूर हैं. मीडिया में ऐसे लोग भी बेशक हैं जो अन्ना हजारे या केजरीवाल जैसा सोच सकते हैं. मगर वे नौकरी के खूंटे से बंधे हैं, और अपनी गुलामी के उत्सव को सेलिब्रेट कर रहे हैं.  हो सकता है मेरा ये कहना किसी को बुरा लगे, मगर यदि किसी भी वजह से आप हमेशा सही को सही नहीं कह सकते, गलत को गलत नहीं कह सकते, तो आप स्वतंत्र कहाँ हैं?  अन्ना हजारे के बोलने और वरिष्ठ पत्रकारों क…