तुम्हें लेकर मेरा उतावलापन 
बचकाने कारनामे 
मेरा अल्लहड़पन 
भले न तुमको भाया हो 
तुमने समझा चंचल मन हूँ 
नहीं हूँ वैसा स्थिर मैं 
जैसा कोई होता है भरा भरा सा 
गहरा गहरा 

पाकर तेरी छाँव ज़रा सा 
बहक गया था 
लेकिन मैंने 
अपने भीतर के बच्चे को मार दिया 
अब देखो चुप चुप रहता हूँ 
भीतर भीतर टीसता हूँ 
जिस बेचैनी के चलते मैं बच्चा था 
उसे अभी भी लिए ह्रदय में 
घूम रहा हूँ 
सब कहते हैं 
मैं कितना गंभीर हुआ हूँ...सोना!

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिंदुस्तान किसानों का क़ब्रिस्तान क्यों बनता जा रहा है?

माँ के लिए