बुधवार, 12 जनवरी 2011

 भोर की आवाज़ 

सुबह जब सोकर उठा 
और देखा 
नहीं है कोई कमरे में 
अख़बार भी नहीं आये थे अभी तक 
किसी और की आहट भी नहीं 
तो मैंने सोचा 
यही एक मौका है 
जब मैं चीख सकता हूँ जोर से 
और दे सकता हूँ अपने आज को अर्थ 
यहाँ मैं और मेरे कमरे की शून्यता 
दोनों हो सकते हैं एकाकार 
वह भरकर मुझे अपने में 
कर सकती है गुंजायमान 

मेरे कमरे के अन्दर 
बोलने को लेकर
नहीं है कोई कानून 
वहां नहीं तने रहते हरदम 
ज़बानों पर नेजे 
इसलिए अक्सर मुक्त कर देता हूँ 
अपनी आवाजें 
अपने कमरे के भीतर के 
खुले आसमान में 
मैं अक्सर सुबह उठकर 
चीखता हूँ जोर से.... 


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