संदेश

January, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
रात भर की  अपार पीड़ा और   आंसुओं के सैलाब के बाद  अब सुबह  महसूस रहा हूँ  अपने मानव को 
मुझे मुझसे मिलाती है  मेरे भीतर की टीस बहुत प्रिय हैं मुझे  मेरे आंसू
सोना! 
देखो मेरी आँखों में  कहीं से गिरा है एक सपना  की तुमने आकर उड़ा दी मेरी तन्हाई  भर गयी मेरी अंगनाई  मैंने लाकर एक चाँद आसमां से  टीप दिया तुम्हारे माथे पर  तुमने तान दिया है  मेरे सर पे  अपना आँचल  मैंने मल दिए तुम्हारे गालों पर  कुछ सुरमई उजाले  तुमने भिगो दिया मुझे  कुछ गीले ख्वाबों से  मुझे भर के आगोश में  तुमने जना अपनी कोख से मुझे  और मैं पा गया हूँ  अपनी मंजिल  तुम्हारी छांव
तमाम रातों में जब 
हमने नहीं रचा कुछ भी  उन्हीं रातों में ज़रा ज़रा सा  रचा गया हमारे भीतर कुछ
मुद्दतों बाद  किसी कवि ने लिखी- एक महान प्रेम-कविता
मौसम
ठण्ड से उनकी मौतों की खबर है 
जिनकी अंतड़ियाँ खाली थीं  कई हफ़्तों से  नहीं देखि थी उन्होंने रोटी  कोई नहीं कहता की उनके घर  आग नहीं पड़ी चूल्हे में  कई रोज़ से  अब नहीं बची थी जान उनकी हड्डियों में  जो मरे हैं ठण्ड से 
इसी तरह गर्मियों में  बरसात में भी  उडती हैं खबरें  रोज़ मरते हैं तमाम लोग  मौसम की मार से  हर मौसम में आता है  ये मौत का मौसम  जहाँ मरते हैं तमाम भूखे लोग
जिन सड़कों से हम गुज़रते हैं  सुबह-शाम दफ्तर आते जाते  उन्हीं सड़कों पर  उसी सुबह-शाम  हो रहा होता है  जवान और खूबसूरत युवतियों का बलात्कार  यह बात जानते हैं सभी राहगीर  जनता जनार्दन  हम-तुम वे सब  बावजूद चुप रहते हैं  बंद कर लेते हैं आँख, कान और ज़बान  गाँधी जी के बंदरों की तरह 
हर सम्त देखते हैं तनी हुई पिस्तौलें  कई खौफनाक चेहरे  और बिखरे हुए लोथड़े  इनसे हम डरते हैं  और करते हैं  अपनी अपनी बारी का इंतजार 
अपने जवान बेटे के रंगे हाथ देखते  और बेटी की आँखों में खौफ को पढ़ते हुए 


भोर की आवाज़ 
सुबह जब सोकर उठा और देखा  नहीं है कोई कमरे में  अख़बार भी नहीं आये थे अभी तक  किसी और की आहट भी नहीं  तो मैंने सोचा  यही एक मौका है  जब मैं चीख सकता हूँ जोर से  और दे सकता हूँ अपने आज को अर्थ  यहाँ मैं और मेरे कमरे की शून्यता  दोनों हो सकते हैं एकाकार  वह भरकर मुझे अपने में  कर सकती है गुंजायमान 
मेरे कमरे के अन्दर  बोलने को लेकर नहीं है कोई कानून  वहां नहीं तने रहते हरदम  ज़बानों पर नेजे  इसलिए अक्सर मुक्त कर देता हूँ  अपनी आवाजें  अपने कमरे के भीतर के  खुले आसमान में  मैं अक्सर सुबह उठकर  चीखता हूँ जोर से.... 

दिल्ली 
ऐसी रौनक  ऐसी चकमक  धन अकूत उडती है रंगत  पैसा तन में पैसा मन में  पैसा ही पैसा रग रग में  न कोई तेरा न कोई मेरा  न इनका न उनका कोई  भागमभाग  अजब सी हरदम  अराजकता की हद तक हलचल  ढूंढे कोई यहाँ ज़िन्दगी  किधर पड़ी वो चीख रही है  हालत पूछे कौन किसी की  भीड़ करोडों की है लेकिन  भीतर तक सब  खाली खाली महानगर में महाशून्यता
कुछ अशआर-


टिका है लहरों पे मेरा वजूद 
बन जा पतवार मेरे कश्ती की  तू खुदा है तो आ दीदार दे  मुझे ख्वाहिश है बुतपरस्ती की  ____
अगर आपे में न रहे कोई
तो अपना ख्याल क्या रखे कोई  दिल में जो दर्द का सैलाब उठे  उसमे कैसे नहीं बहे कोई  ____
समझता है ज़बां धड़कन कि मेरी दूरियां हैं मगर इतनी नहीं हैं
बैठ के दिल में मेरे कह रहा है मेरा महबूब हम तेरे नहीं हैं
मेरी हर साँस से बावस्ता तुम तुम्हारी हर अदा से वाकिफ मैं
अगर पूछे कोई रिश्ता हमारा बता देना कि दोनों अजनबी हैं

______



न जाने कितने दिलों में कसक बची होगी न जाने कितनी आरजू भी रह गयी होगी
न जाने किसकी खुलीं पलकें कि सुबह आई
न जाने किसकी हंसी नूर भर गयी होगी

--------

मैं खुद से बात करता हूँ खुद ही से डर भी जाता हूँ
रूठता हूँ कभी खुद से कभी खुद को मनाता हूँ
पिघल जायेगा इक दिन तू इसी उम्मीद से या रब
मैं तेरे नाम की माला उँगलियों पे फिराता हूँ

--------
किसी की साये से हमने जो मोहब्बत कर ली
तुम्ही कहो, गुनाह हो गया कहाँ मुझसे
तुम्हें लेकर मेरा उतावलापन 
बचकाने कारनामे  मेरा अल्लहड़पन  भले न तुमको भाया हो  तुमने समझा चंचल मन हूँ  नहीं हूँ वैसा स्थिर मैं  जैसा कोई होता है भरा भरा सा  गहरा गहरा 
पाकर तेरी छाँव ज़रा सा  बहक गया था  लेकिन मैंने  अपने भीतर के बच्चे को मार दिया  अब देखो चुप चुप रहता हूँ  भीतर भीतर टीसता हूँ  जिस बेचैनी के चलते मैं बच्चा था  उसे अभी भी लिए ह्रदय में  घूम रहा हूँ  सब कहते हैं  मैं कितना गंभीर हुआ हूँ...सोना!
मेरा होना उन्हें नहीं भाया
नहीं होना मुझे नहीं आया  डूब कर मरने की तमन्ना थी कोई कतरा मगर नहीं पाया  मैंने इन्सान होना चाहा तो  जीना मरना मुझे नहीं आया  तेरी दुनिया है बहुत दूर की बात  साथ रहता नहीं मेरा साया  मेरे दिल में तू कहाँ रहता है  मैनें ढूँढा बहुत, नहीं पाया  मेरा महबूब इस जहाँ का नहीं  तो खुदा मुझको यहाँ क्यों लाया 
१. कानून 
वे जो भूखे हैं रटते हैं रोटी रोटी  मारो उन्हें  वरना आयेंगे हमारे शहर  गन्दा करेंगे  हमारे बंगलों में हिस्सा मांगेंगे  हमारे पकवानों पे दंती रहेगी  इनकी घाघ निगाह  पेट के लिए चोरी करते हैं  ये उचक्के  कर करके आत्महत्याएं  करवाते हैं बदनामी 
और वे जो लड़ते हैं इनके लिए  मचाते हैं इनकी मौत पर हल्ला  मनाते हैं मातम  मारो उन्हें भी  भरमाते हैं ये  भोले भाले नागरिकों को  उकसाते हैं उन्हें  लड़ने को, अपना हक़ लेने को  खतरा खड़ा कर सकते हैं ये  देश के लिए  इनकी पहचान करो  ले जाओ आँख पर पट्टी वाली  देवी के दरबार में  दिलवा दो फांसी...