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मैं कहता हूँ

मैं कहता हूँ वो बातें 
उस भाषा में  जो अम्मा औ बाबुजी को  सहज समझ में आती हों  क्योंकि वे दोनों अनपढ़ हैं  और मुझे लगता है  जो वे समझेंगे  मेरे देश का बच्चा-बच्चा समझेगा  क्योंकि वे सब अनपढ़ हैं  अम्मा औ बाबू की नाईं वे भी खांटी देसी हैं  दिल्ली के शह और मुसाहिब  उनके लिए विदेसी हैं 
मेरी माँ बोली है मुझसे  तुम इनकी आवाज़ बनो  सुर भर दो नीरव जीवन में  ऐसा सुन्दर साज़ बनो  इनके जल-जंगल-ज़मीन की रक्षा करना  तोपों से, बंदूकों से तुम  कभी न डरना 
घर में एक ही लाठी थी  वो बाबू को दे आया हूँ  अपनी कलम दवात महज़   अपने झोले में लाया हूँ  एक-एक बच्चे की बातें  मैं कान लगाकर सुनता हूँ  अक्षर-अक्षर रोता हूँ  तिल-तिल कर हर दिन मरता हूँ 

अलविदा अदम..!

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कृष्णकांत आजसुबहहोतेहीएकदुखद खबर आयीकिअदमजीनहींरहे।वेकुछसमयसेबीमारचलरहेथे।यहआशंकापहलेसेथीकिकहींकुछअनहोनीनहोजाये, क्योंकिवेकाफीबीमारथे।जीवनभरसाथरहीतंगहालीअंततकउनकेसाथरही।थोड़ीथुक्का-फजीहतकेबादजबतकमददकेलिएकुछहाथउठे, अदमजीकादाना-पानीइसजहांसेउठगया।शायदइसखुद्दारशायरकोकिसीकारहमो-करम

द डर्टी पिक्चर मतलब एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट

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अमित सिंह
सिल्क कहती हैं कि किसी भी फिल्म को चलाने के लिए उसमें सबसे जरूरी तीन चीजें होती हैं एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट। फिल्म डर्टी पिक्चर में यही चीज है। यह फिल्म साउथ की फिल्मों में अपने हुस्न का जला दिखाकर स्टार बनी सिल्क स्मिता की कहानी कहती है। हालांकि अपने हुस्न का जला दिखाकर स्टार बननेोलों में सिल्क अकेला नाम नहीें थीं और भी अभिनेतियां मसलन नायलोन नलिनी और पालिस्टर पदमिनी आदि ने भी इस दौर में अपनी कामुक अदाओं और अंग प्रदर्शन के जरिये दर्शकों को दीाना बना दिया था। यह फिल्म उस दौर के सिनेमा पर बात करती है और इसी बहाने या कहें सिल्क के बहाने पुरूष प्रधान समाज पर गहरा व्यंग करती है। पुरुष प्रधान समाज महिला की बोल्डनेस से भयभीत हो जाता है। पुरुष बोल्ड हो तो इसे अगुण नहीं माना जाता है, लेकिन यह बात महिला पर लागू नहीं होती। पर यहां तो किस्सा ही दूसरा है। सुपरस्टार सिल्क और बोल्डनेस एक-दूसरे के पर्यायाची हैं। और हां उनकी यही बात उनकी बिखरी जिंद्गी एं रहस्मय अंत की कारण भी बन जाती है। फिल्मों में सफलता पाने के लिए सिल्क अच्छा-बुरा नहीं सोचती है। ह मादकता का ऐसा तूफान हैं, …

गाँधी का नाती

चिकना चुपड़ा लल्लू खुद को  गाँधी का नाती कहता है  गांव में आकर खुदको  हम सबका सच्चा साथी कहता है 
जितने का घर-बार हमारा  उतने का तो कुरता उसका  दिल्ली और सीकरी उसकी  रोटी उसकी ज़र्दा उसका 
हमने कहा कि महंगाई है  भकुआ चुप्पैचाप रहा  हम बोले कि घर नाहीं है  भकुआ चुप्पैचाप रहा  हम बोले गगरी खाली है  भकुआ चुप्पैचाप रहा   बस्ती का बच्चा-बच्चा है  ठण्ड-भूख से कांप रहा 
कलावती से प्यार जताकर  कुछ बच्चों को गोद उठाकर  कई बार मेरे ही घर को  वह अपना घर-बार बता कर  चला गया है मूर्ख बनाकर  इसके सारे राज़ पता कर  कौन है यह अंग्रेज का बच्चा  सरपत को गन्ना कहता है   किस चक्कर में आता है यह  तरह-तरह चालें चलता है  अख़बारों में काहे इसका  बड़ा-बड़ा फोटो छपता है 
आता है हर साल गांव में  खूब तमाशा करता है  सब बच्चों से रामराज का  झूठा वादा करता है  कहीं मुश्किलें सारी हमने  नहीं किसी पे कान दिया  अगले ही दिन अपना तम्बू  बगल गांव में तान दिया 
आठ महीने से घर में  कोई भी सालन नहीं बना  कोदौ-किनकी नाहीं मयस्सर  कहाँ मिलेगा खीर-पना कुछ-कुछ दिन पर भूख के मारे  कोई न कोई मरता है  आँख बंद है कान बंद है  और ज़मीर पर पर्दा है 
अबकी आये टेन्ट लगाये  सारे बल…