रविवार, 14 नवंबर 2010

विदर्भकन्‍या की मौत पर

सूर्यकान्‍ता राधेश्‍याम पटेल!

तुम नहीं दे सकी
उन मुर्दा कंकालों का साथ
जो बिलबिलाते फिरते हैं
विदर्भ की धरती पर

तुम जी सकती थी
उनके साथ
संसद की बहसें और
घोषणाएँ सुनते हुए
और गोबर से दाने बीनकर भी तो
पेट भरा जा सकता था
तुमने क्‍यों न किया
भूख से तड़पने और जीते जाने की
परंपरा का निर्वाह?

तुम जी सकती थी
अरबपतियों की संख्‍या पर इतराकर
विकास-दर पर कूल्‍हा पीटते हुए
तुम जी सकती थीं
इस देश की
टुकड़ा-टुकड़ा अस्‍मिताओं पर
गर्व से फूली हुई

बुजदिल!
तुमने क्‍यों नहीं किया इंतजार
कि आयेंगे इक दिन
‘युवराज'
तुम्‍हारे अंगना
तुम्‍हारी खटिया पर बैठकर
रोटी खायेंगे
लोटे में पानी पियेंगे
और हर लेंगे सारे दुःख
जैसे कृष्‍ण ने हर लिया था
सुदामा का

वैसे सच कहूँ
तुम्‍हें जीने का हक ही नहीं था
जब पूरा हिन्‍दुस्‍तान
झूम रहा है
चीयर लीडर्स के साथ
तब तुम क्‍यों विचलित हुईं
अपनी झुलसी फसलें देखकर

सूर्यकान्‍ता
तुम नहीं हो तो क्‍या
विदर्भ की धरती तो तब भी
मनाती रहेगी
तमाम भूखे मरियल वसन्‍त का उल्‍लास
आगे भी।

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