सोमवार, 22 नवंबर 2010

मुसलमानों में खत्म हो अल्पसंख्यकबोध
                                                                                  -इम्तियाज अहमद
मुसलमान हजारों साल पुराने भारत के पारंपरिक ढांचे का हिस्सा रहा है. इसमें अकबर जैसे महान शासक भी रहे और बहादुरशाह जफर जैसे महान क्रांतिकारी  भी. परंतु इस दौरान जो सामुदायिक संवाद समाज में उत्पन्न हुआ था, वह अंग्रेजों के आने से टूट गया. दुर्भाग्य से यह टूटन आजादी के बाद  भी बरकरार रही. अंग्रेजों का पैदा किया गया फासला देश आजाद होने के बाद  भी खत्म नहीं हो पाया. गौर करने की बात है कि 1931 से पहले मुसलमान की कोई परिभाषा नहीं थी. यह काम पहली बार अंग्रेजों ने किया. इसके पहले मुसलमान हिंदू कानून के मुताबिक जमीन बांटे या इस्लामिक कानून के मुताबिक, कोई फर्क नहीं पड़ता था. इरादतन मुसलमानों का एकाकीकरण किया गया. उनकी अलग पहचान और शिनाख्त बनाने में कानून और सेंसर का इस्तेमाल हुआ. एक बार जब यह हो गया तो मुश्किलें शुरू हो गयीं. पिछले करीब सौ- सवा सौ सालों से मुसलमानों का एकमात्र तर्क रहा है कि हम सुरक्षित नहीं हैं. हमारे साथ ज्यादाती हुई है. हम पिछड़े हैं. इससे जो स्थिति उत्पन्न होती है वह सरकारों को मुसलमानों को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल का मौका देती है. मुसलमानों ने शिकायत की कि हम पिछड़े हैं, तो सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग बना दिया. उन्होंने शिकायत की हम अशिक्षित रह गये और हमारी भागीदारी पर्याप्त नहीं है तो सरकार ने उन्हें आरक्षण दे दिया.  शिकायत की कि हम आर्थिक रूप से पिछड़े हैं तो सरकार ने अल्पसंख्यक विभाग बना दिया. इससे कोई फायदा हुआ हो, मुझे तो नहीं लगता. आठ करोड़ रुपये में 20 करोड़ मुसलमानों का क्या भला होगा? आरक्षण, बैंक में कोटा, सच्चर कमेटी आदि सारी कवायदें फिजूल हैं क्योंकि आम मुसलमान की परेशानियां तो वहीं की वहीं हैं. लेकिन मुसलमान अपने लिए अलग आयोग या कोटे की बात सुनकर संतुष्ट हो जाता है. जबकि इसका फायदा एलीट क्लास को होता है. मुसलमानों में सर्वमान्य और परिपक्व नेतृत्व का न होना भी मुसलमानों को नुकसान देता है. मेरे ख्याल से सर सैय्यद अहमद खां हिंदुस्तान में मुसलमानों के आखिरी नेता थे. 150 सालों से यह खालीपन बना हुआ है. सही प्रतिनिधित्व मुसलमानों को आगे बढ़ने में मदद कर सकता है. मुसलमानों में शुरू से ही यह धारणा रही है कि उनके विकास का जिम्मा सरकार का है. यह कितना गलत है. बिना निजी स्तर पर उद्यमशील हुए कोई समाज विकसित नहीं हो सकता. सरकार योजनाएं बना सकती है, फिर अमल तो हमें ही करना होता है. समाजिक विकास को सरकार के भरोसे छोड़कर उदासीन रहना रहना समाज को और पीछे ले जाता है. जहां तक अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन का सवाल है तो हम ऐसा नहीं कह सकते कि सारे मुसलमान पिछड़े हैं. हिन्दुओं की तरह मुसलमानों में  भी एलीट और दलित वर्ग है. एलीट वर्ग आम मुसलमानों के नाम पर मुद्दों को हवा देकर खुद फायदे उठाता है. आम मुसलमान आर्थिक दृष्टिकोण से बाकी समुदायों की तुलना में पिछड़ा है. इसका कारण सरकारें हंै कि नहीं, मैं नहीं कह सकता. इसके सबसे बड़े कारण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हैं. मसलन, अगर मैं हिंदू से मुसलमान बना होता तो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता. परंतु ज्यादातर धर्मांतरण पिछड़ी जातियों से हुए. वे पिछड़े हिंदू से पिछड़े मुसलमान हो गये. उनकी आर्थिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया. दूसरे, मुसलिम समुदाय की अपनी संस्कृति भी उनके विकास में आड़े आती है. वे अपने बच्चों को स्कूल की बजाय मदरसे में भेजने को ही तवज्जो देते हैं. अब सरकार आपसे अपने बच्चे को स्कूल भेजने को कह सकती है लेकिन अगर आप नहीं भेजते तो वह इसके लिए पुलिस नहीं लगा सकती. बंदूक दिखाकर आपके बच्चे को शिक्षा नहीं दी जा सकती. समाज का सांस्कृतिक स्वरूप बदलने के साथ मुसलमान नहीं बदला इसलिए सांस्कृतिक रूप से वह पिछड़ा रह गया. इस सांस्कृतिक पिछड़ेपन को दूर करने जरूरत सबसे पहले है. इसलाम जाने-अनजाने असमानता का पक्षधर है. एक श्रेणीबद्ध व्यवस्था है जिसमें ईश्वर के आगे जो स्थान पुरुष का है, पुरुष के आगे वही स्थान स्त्री का है. ये स्थितियां पिछड़ेपन का कारक बनी हैं. 
जिस तरह हिंदुओं में दलित हैं उसी तरह मुसलमानों में भी दलित वर्ग हैं. जो लोग इससे इनकार करते हैं, वे गलत हैं. आर्थिक आधार पर पहचान किये बिना उनका उद्धार संभव नहीं है. मुसलमानों या अन्य किसी समुदाय को अल्पसंख्यक इस आधार पर नहीं माना जाना चाहिए कि वे संख्या में कम हैं. पिछड़े रहने से अल्पसंख्यक होने का कोई संबंध नहीं है. किसी समुदाय को अल्पसंख्यक मानने के तीन आधार होने चाहिए. पहला, नीति-निर्धारण में उसकी क्या हैसियत है. दूसरा, धार्मिक रूप से उनकी क्या स्थिति है. तीसरा, वह वंचित हैं या संपन्न. अल्पसंख्यक की परिभाषा में अर्थ बहुत महत्वपूर्ण है, जबकि हमारे यहां सिर्फ धर्म को ही महत्व दिया जाता है. कोई समुदाय संख्या में कम होकर  भी अगर आर्थिक रूप से मजबूत है तो वह हावी हो सकता है. अल्पसंख्यक होने का पैमाना वंचना और समृद्धि होनी चाहिए. अल्पसंख्यकों के पीछे रहने की एक और वजह लगातार उनका विभाजन अथवा विस्थापन भी है. जहां-जहां विकास के नाम पर विस्थापन हो रहा है, दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी ही प्रभावित हो रहे हैं. कहीं  भी ऐसा नहीं है जहां बहुसंख्यक और संपन्न वर्ग को विस्थापित कर अधिग्रहण हुआ हो. अगर कोशिश भी हुई तो सफल नहीं हुई. इसके चलते अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदायों में स्टेट के प्रति विश्वास घटा है. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि किसी समुदाय की रोजमर्रा की चेतना में यह बात नहीं होनी चाहिए कि मैं पीछे हूं. माइनाॅरिटी का उत्थान तब होता है जब वह यह मानने से इनकार कर दे कि हम माइनारिटी में नहीं हैं. समुदायों का अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक होना नीतिगत स्तर पर प्रभाव डालता है. इससे उत्पन्न स्थितियां विकास प्रक्रिया को बाधित करती हैं. क्योंकि कोई देश अपने ही एक समुदाय को पीछे छोड़कर विकास नहीं कर सकता. 
मुगलकाल में बहुसंख्यक मुसलमान हथियार बनाने में लगा हुआ था. अंग्रेजों के आने पर यह व्यवसाय प्रभावित हुआ. बादशाही के खात्मे के साथ बंदूकों की जरूरत  भी खत्म हो गई. इससे कामगार मुसलमान आटोमोबाइल की तरफ मुड़ गया. आज आप देख सकते हैं कि आटोमोबाइल में लगे हुए ज्यादातर लोग मुसलमान हैं. समय बदलने के साथ अवसर उत्पन्न हुए और मुसलमान आॅटोमोबाइल से आगे भी बढ़ने लगा है. अब वह विभिन्न क्षेत्रों में दखल दे रहा है. सिविल और उद्योग, आदि क्षेत्रों में जहां  भी अवसर हैं, मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है. आजादी के समय मुसलमान अल्पसंख्यक था और नाजुक परिस्थिति के चलते वह सहमा था. एक स्वाभाविक डर था कि वह सुरक्षित रहेगा कि नहीं. परंतु जैसे-जैसे धर्मनिरपेक्षता मजबूत हुई मुसलमानों का आत्मविश्वास बढ़ा है. उसे यह बोध हो चुका है कि हम भी अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे. आज मुसलमान अपने अधिकारों के प्रति हिंदुओं से ज्यादा जागरूक है. यह अलग बात है कि वह कभी सही करता है तो कभी गलत. हाल ही में अयोध्या मामले में जो फैसला आया है उससे मुसलमान निराश जरूर हैं, पर उसका आत्मविश्वास बरकरार है. वह जानता है कि अभी लड़ने का समय नहीं है. सरकार अगर उनकी हर बात मान नहीं सकती तो हर निर्णय उनके विरुद्ध भी नहीं ले सकती. हिंदुस्तान में मुसलमान का भविष्य उतना अंधकारमय नहीं है जितना कि वह समझता है. कठिनाइयां जरूर हैं. कुछ राज्य की ओर से तो कुछ खुद उसकी ओर से. अल्पसंख्यक होकर मुसलमान क्या कर सकता है, उसे जिम्मेदारी से इस पर सोचना चाहिए और कदम उठाना चाहिए.
 (लेखक समाजशास्त्री हैं और जवाहरलाल नेहरू विवि में प्रोफेसर रह चुके हैं. लेख बातचीत पर आधारित)

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