सोमवार, 22 नवंबर 2010

 गुब्बारों का समय 


भूख गरीबी हक की बातें बंद करो
देखो दिल्ली की रंगीनी मस्त रहो

सत्तर करोड़ का गुब्बारा
आसमान में नाचा
लाखों के राकेट, फुलझड़ियां
उड़ीं, जहां ने देखा
धन्य, बहे रुपये अकूत
दुनिया ने खूब सराहा
कंडोमों से पटे टायलेट
भारत का भविष्य उज्ज्वल
विद्वानों ने फरमाया

सत्तर हजार करोड़ रकम में
तीरंदाजी, खेल-तमाशा
पीठ ठोंकता राष्ट्रसंघ
भजते सरकोजी, ओबामा

कौन सिरफिरा राग टेरता
भिखमंगों-भुक्खाड़ों का
बंद करो मुंह इनका, पकड़ो
द्रोही है, चालान करो

कालाहांडी और झाबुआ वालों से भी
ये कह दो
’शांत’ रहें, उनको भी पैकेज
इक न इक दिन पहुंचेगा
सोलह आने नहीं सही तो
पंद्रह पैसे पहुंचेगा
देश हुआ जागीर किसी की
सब्र करो
सुबह शाम धनपतियों की
उंगली पर गिनती किया करो
युवराजों के राजतिलक में
बढ़-चढ़ हिस्सा लिया करो
आये नये मसीहा
बस उनका ही वंदन किया करो


भूख गरीबी हक की बातें बंद करो
देखो दिल्ली की रंगीनी मस्त रहो.......

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