शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

विज्ञान के सहारे फैलता अंधविश्वास
                                                                      

कई छोटे-बड़े चैनलों ने करीब एक साल से ऐसे उपकरणों का प्रचार करना शुरू किया है जो दुनिया की सभी समस्याओं को हल कर सकते हैं। ये उपकरण प्यार में धोखा खाये, परीक्षा में फेल हुए, धंधे में घाटा उठाये, दुश्मनों से मात खाये और जीवनसाथी के इमोशनल अत्याचार से परेशान लोगों के लिए ब्रहमास्त्र का काम करते हैं। चैनलों के मुताबिक ऐसी समस्याओं का कारण बुरी नजरें और उपरी हवाएं हैं। अगर आपका बच्चा ज्यादा रोता हो, घर में एक साथ कई लोगों का सर दर्द करता हो या घर के लोग बीमार रहते हों, बच्चा पढ़ता हो और पास न होता हो तो इसका मतलब है कि आप पर किसी की बुरी नजर है। इस बुरी नजर से बचने का उपाय चैनलों के पास नजर रक्षा कवच, शिवशक्ति रक्षा कवच, जीवन रक्षा कवच, शनि रक्षा कवच के रूप में मौजूद है। इनके प्रचार में चैनलों ने एक पूरी टीम लगायी है। एंकर इनकी खूबियां गिनाता है फिर इन बातों की विश्वसनीयता के लिए ज्योतिषाचार्य को पेश करता है। नागरिकों को इससे फायदा भी हो रहा है, यह दर्शाने के लिए कई गृहस्थ और गृहणियों को पेश किया जाता है जो यह बताते हैं कि हमने कवच धारण किया और चमत्कार हो गया । इनकी बिक्री के लिए देश के सभी शहरों में और विदेशों में भी ऐजेंट हैं जो आपको ये कवच उपलब्ध करा सकते हैं। प्रति कवच की कीमत मात्र 2400 से 5000 रू0 के बीच है।
इनका महात्म्य बताने के क्रम में भागम-भाग जिंदगी की रोजमर्रा की समस्याओं को शनि देव की नाराजगी से जोड़कर एंकर कहता है कि शनि देव की नाराजगी का मतलब है विनाश। अगर आप यह कवच धारण करते हैं तो शनि देव खुश होंगे और आपका कल्याण होगा। वांछित फल की प्राप्ति होगी।
गौरतलब है कि नये परिवेश की समस्याओं और अनिश्चितताओं को कथित बाबाओं और पंडितों ने भांप लिया है। मध्यवर्गीय समस्याओं को शनि आदि का प्रकोप बताकर लोगों में भय पैदा किया जा रहा है। यह भय ही अंधविश्वास का बाजार खड़ा करता है। यह साधारण सा बालसुलभ सवाल है कि अगर कोई देवता इतना शक्तिशाली और कल्याणकारी है तो वह लोगों में इस कदर आतंक क्यों फैलाता है? और भी, अगर हम चार हजार रूपये ज्योतिषी को देकर रक्षाकवच पहन लेंगे तो उस देवता को क्या मिलेगा? जाहिर है यह पोंगापंथी-षडयन्त्र है जो ऐसे आधार पर रचा जाता है जिसका किसी तरह का कोई प्रमाण ही नहीं है।
इस कवच-व्यवसाय का देश-विदेशांे में नेटवर्क होना ही इस बात का प्रमाण है कि यह विशुद्ध व्यवसायिक आयोजन है जो अंधविश्वास पर धर्म का मुलम्मा चढ़ाकर चलाया जाता है। टीवी, जिसके विकास को मार्शल मैकलूहान ने 20वीं सदी की वास्तविक क्रान्ति कहा था, का भी प्रयोग इस व्यवसाय में होने लगा है। बाबाओं ने देर से सही टीवी की ताकत को पहचान लिया है। आखिर टीवी बाजार का सबसे प्रभावशाली वाहक और प्रेरक है जिसकी पंहुच उस मध्यवर्ग तक है जो बाजार की नियामक शक्ति है। इस वर्ग मंे धर्मभीरूता को भुनाकर अच्छा लाभ कमाया जा सकता है।
विज्ञान के विकास के साथ यह धारणा बननी शुरू हुई कि जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ेगा वह अंधविश्वासों से उबरकर तार्किक होता जायेगा। मगर टीवी, जो विज्ञान के उत्क्रष्टतम अविष्कारों में से एक है, का इस्तेमाल अंधविश्वास को और पुख्ता करने में किया जा रहा है। बीती सदियों में सुधार आन्दोलनो के जरिये कर्मकाण्ड और पोंगापंथी को लेकर को आवाजें भी उठायीं गयीं लेकिन वे बेहद क्षीण साबित हुईं। इसके बरक्स इन्हें फैलाने वाले ज्यादा सक्रिय रहे क्यांेकि यह उनकी रोजी-रोटी का सवाल है। दुखद तो यह है कि आम आदमी पढ़ा लिखा होकर भी इन बातों पर विश्वास कर लेता है और भयभीत हो जाता है। वह अपनी रोजमर्रा की समस्याओं को शनि और शिव के प्रकोप के तौर पर देखता है। अंधविश्वास अब समय के हिसाब से अपने को बदलकर नये स्वरूप में नुमाया हो रहा है।
कहने की जरूरत नहीं कि टीवी ऐसा माध्यम है जिसके सहारे कूड़ा भी मंहगे दामों में बेचा जा सकता है। वह आज हमारी दिनचर्या निर्धारित कर रहा है। टीवी का अपना सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव है। वह अगर नागरिकों को उपभोक्ता में बदल सकता है तो उन्हें खांटी किस्म का पोंगापंथी भी बना सकता है। यह टीवी और फिल्मों का ही प्रभाव है कि पिछली सदी में कई लोग सन्त से देवता में तब्दील होकर पूजे जाने लगे। धर्म के नाम पर चलने वाले चैनल भी अंधविश्वास और व्यक्तिपूजा को ही बढ़ावा देते हैं। इसी के चलते यह स्थिति बन रही है कि पांच रूपये की ताबीज बनाने वाला बाबा अब पांच हजार की ताबीज बनायेगा। बड़े चैनलों द्वारा ऐसी निराधार और अवैज्ञानिक बातों का प्रसार मीडिया का चरित्र दर्शाता है। इस वैज्ञानिक युग में वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से अंधविश्वास का प्रसार बेहद चिंताजनक है।

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